
मुंबई के आसमान में सूरज पहले ही काफी ऊँचा चढ़ चुका था जब आधिरा की आँखें आखिरकार खुलीं। दोपहर के करीब 12 बजे थे। होटल के बड़े-बड़े खिड़कियों से तेज़ रोशनी अंदर आ रही थी, जो उसकी आँखों को चुभ रही थी। उसका सिर भारी था, जैसे किसी ने हथौड़े से मारा हो। पूरा शरीर दुख रहा था, खासकर नीचे का हिस्सा। उसके पैरों के बीच एक गहरी, जलन वाली दर्द थी, जिससे वो हल्के से सिसकारी लेते हुए हिली।
वो कई बार पलकें झपकाई, ये समझने की कोशिश कर रही थी कि वो कहाँ है। ये उसका छोटा सा अपार्टमेंट नहीं था। ये एक बड़ा, शानदार होटल का कमरा था। बिस्तर बहुत बड़ा था, चादरें नरम और सफेद, लेकिन पूरी तरह अस्त-व्यस्त। फर्श पर कपड़े बिखरे पड़े थे। उसका कल रात का काला ड्रेस, उसके जूते, सब कुछ इधर-उधर फेंका हुआ था।
आधिरा धीरे से उठकर बैठी, सफेद चादर को सीने से लगाकर। फिर उसने नीचे देखा। उसका दिल एकदम रुक गया। वो पूरी तरह खाली थी। शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं। और जब उसने ध्यान से देखा, तो निशान हर जगह थे गले, कंधों, छाती और जांघों पर लाल-बैंगनी किस के निशान। कमर और बाहों पर उंगलियों के निशान। उसकी त्वचा इतनी नाजुक लग रही थी, जैसे बहुत ज़्यादा छुआ और पकड़ा गया हो।
“ओह नहीं... हे भगवान... क्या हुआ?” वो खुद से फुसफुसाई, आवाज़ काँप रही थी। आँखों में आँसू भर आए। कल रात की यादें फ्लैश की तरह आने लगीं पार्टी, चक्कर आना, वो अजनबी जो उसकी मदद करने आया, कमरा, गर्मी, करीब होना। लेकिन उसके बाद सब धुंधला था। उसने चुंबन याद किए, हाथ, जुनून... लेकिन चेहरा साफ़ नहीं, शब्द साफ़ नहीं। वो बोली नहीं... ये सच नहीं हो सकता। क्या मैं... क्या हम...?
उसके नीचे के हिस्से का दर्द सच बता रहा था। दर्द इतना था जैसे ये उसका पहली बार था। वो डर गई, शर्मिंदा हुई, अपराधबोध से भर गई। वो बोली "मैंने ये कैसे होने दिया? मुझे तो उसका नाम भी नहीं पता... मैं होश में नहीं थी...”
वो धीरे से सिर घुमाकर बिस्तर के दूसरी तरफ देखा। वहाँ एक आदमी सो रहा था वेदांत। वो पेट के बल लेटा था, चेहरा तकिए में दबा हुआ, उसकी तरफ़ नहीं। उसकी चौड़ी पीठ नंगी थी, मसल्स साफ़ दिख रहे थे, नींद में भी। चादर सिर्फ़ कमर तक थी। लेकिन उसका चेहरा... वो ठीक से नहीं देख पा रही थी। रोशनी उसके पीछे से आ रही थी, बाल माथे पर गिरे हुए थे। सिर्फ़ जबड़े की तेज़ लाइन और दाढ़ी का थोड़ा सा हिस्सा दिख रहा था। पूरा चेहरा नहीं।
आधिरा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। डर ने सब कुछ घेर लिया। वो बोली "मैं यहाँ नहीं रह सकती... मुझे जाना है... अभी!”
वो घबरा गई। वो उसे जगाना नहीं चाहती थी। न उसका चेहरा देखना था, न बात करनी थी। बस इस गलती से भाग जाना था।
वो चुपचाप, डरी हुई चींटी की तरह बिस्तर से उतरी। पैर कमज़ोर थे, दर्द से वो होंठ काट रही थी ताकि चीख न निकले। उसने जल्दी से फर्श से कपड़े उठाए अपना काला ड्रेस, अंडरगारमेंट्स, जूते। सब उसके कपड़ों में मिले हुए थे। उसने जल्दी-जल्दी पहन लिए, ये भी नहीं देखा कि सिलवटें पड़ गईं या उल्टा पहन लिया। हाथ काँप रहे थे। आँसू चुपचाप गालों पर बह रहे थे।
एक आखिरी नज़र सोते हुए आदमी पर। उसका चेहरा अभी भी छुपा था। “तुम कौन हो...? ये क्यों हुआ...?” वो मन ही मन सोची, लेकिन कोई जवाब नहीं।
उसने साइड टेबल से अपना छोटा क्लच उठाया और दरवाज़े की तरफ़ चुपके-चुपके गई। दरवाज़ा धीरे से खोला, बाहर झाँका कि कोई देख न ले, और फिर भाग गई। पीछे मुड़कर नहीं देखा। लिफ्ट का इंतज़ार नहीं किया सीढ़ियाँ लीं, रोते हुए, हर कदम पर दर्द से कराहते हुए। होटल के लॉबी तक पहुँचते-पहुँचते उसने आँसू पोंछ लिए और नॉर्मल दिखने की कोशिश की। उसने कैब बुक की और सीधे घर चली गई, दुआ मांगते हुए कि कोई इस रात के बारे में कभी न जाने।
एक घंटे बाद वेदांत की आँख खुली। कमरा शांत और चमकीला था। उसने अपनी मज़बूत बाहें फैलाईं और हल्के से मुस्कुराया, रात की यादों में खोकर। उसका शरीर इतना रिलैक्स और संतुष्ट था जैसे पहले कभी नहीं हुआ। वो दूसरी तरफ़ मुड़ा, उम्मीद करते हुए कि कल रात की वो खूबसूरत लड़की अभी भी वहाँ होगी।
लेकिन बिस्तर खाली था। सिर्फ़ तकिया पर उसका निशान था। “वो कहाँ गई...?” उसने गहरी, नींद भरी आवाज़ में कहा। वो धीरे से उठा, चादर उसके नंगे शरीर से सरक गई। उसने कमरे में चारों तरफ़ देखा। उसके कपड़े गायब थे। उसका पर्स गायब था। सिर्फ़ हवा में उसकी मीठी परफ्यूम की हल्की खुशबू बाकी थी।
वेदांत बिस्तर से उठा और बिना कपडो के ही बाथरूम की तरफ़ चला गया। वो आईने में खुद को देखने लगा पीठ पर उसके नाखूनों के निशान, कंधे पर छोटा सा दाँतों का निशान। उसने उन निशानों को छुआ और एक खतरनाक मुस्कान दी। उसने मन ही मन सोचा वो कितनी जंगली थी... भले ही वो कन्फ्यूज़न में थी।
उसकी नज़रें उन निशानों पर टिकीं। पीठ और कंधों पर गहरी लाल लकीरें उसके नाखूनों ने इतनी जोर से खींचा था, जैसे वो खुद को उससे जोड़कर रखना चाहती हो जब वो उसे बेकाबू होकर अपना कर रहा था। उसने उन निशानों पर उंगलियाँ फेरीं, थोड़ा दबाया, दर्द की वो तेज़ किस फिर महसूस की। होंठों पर एक खतरनाक मुस्कान फैल गई।
“फक... वो कितनी वाइल्ड थी,” उसने खुद से कहा, आवाज़ रूखी और संतुष्टि से भरी।
बाएँ कंधे पर एक छोटा, परफेक्ट दाँतों का निशान उसका काटना, कच्चा और मालिकाना। उसने उसे छुआ, अँगूठे से उस नीले निशान पर फेरा, याद करते हुए वो पल जब उसने उसके कलाई ऊपर पकड़ रखी थी और इतनी गहराई से धक्का मारा था कि वो मैट्रेस से ऊपर उठ गई थी, उसका नाम पुकारते हुए जैसे प्रार्थना और श्राप दोनों एक साथ।
वो थोड़ा मुड़ा, खुद को आईने में देखते हुए, उस जुनून की नक्शे को निहारते हुए जो उसने उसके शरीर पर छोड़ा था।
“उसने मुझे ऐसे मार्क किया जैसे मैं उसका हूँ,” उसने सोचा, और ये विचार सुनकर उसका पार्ट फिर से सख्त होने लगा, भले ही कल रात उसने उसके अंदर चार बार जा चुका था। “लेकिन हम दोनों जानते हैं कि असल में कौन किसका है।”
फिर वो बिस्तर पर लौटा और सफेद चादर पर नज़र डाली। वहाँ था बीच में एक छोटा सा लाल खून का दाग। सबूत कि वो वर्जिन थी। कि कल रात से पहले वो पूरी तरह शुद्ध थी। वेदांत की मुस्कान और गहरी, और मालिकाना हो गई। उसके सीने में एक गहरी संतुष्टि भर गई। उसने उसका पहला बार लिया था। कल रात उन्होंने कई बार प्यार किया था जुनूनी, तीव्र, बेकाबू। वो उसकी नरम कराहतें याद कर रहा था, उसके नीचे उसका शरीर, वो तरीका जिससे वो नशे और चाहत में भी खुद को सौंप रही थी। ये उसकी ज़िंदगी की सबसे अच्छी रात थी। किसी और औरत ने उसे कभी इतना सुख और संतुष्टि नहीं दी थी।
वेदांत बिस्तर के किनारे बैठ गया, उस खून के दाग को ट्रॉफी की तरह देखते हुए।
उसने आँखें बंद कीं और यादें आने दीं कच्ची, साफ़।
वो पहले हिचकिचाई थी, आँखें चौड़ी और नशे से धुंधली, होंठ काँप रहे थे जब उसने उसे चूमा था। लेकिन जैसे ही उसने अंदर धकेला धीरे से पहले, उसे हर मोटे इंच को महसूस करने दिया वो सिसकारी, उंगलियाँ उसके कंधों में गड़ा दीं, शरीर काँप उठा। और फिर वो टूट गई।
दूसरे धक्के पर वो ज़ोर से कराही टूटी हुई, ज़रूरतमंद। तीसरे पर वो माँगने लगी “जोर से... प्लीज़... मत रुको...”
उसे याद था कि उसकी टाइट, वर्जिन पार्ट ने उसे कैसे जकड़ा था जैसे मुट्ठी, इतनी गर्म, इतनी गीली, इतनी परफेक्ट। हर बार जब वो लगभग बाहर निकलता और फिर ज़ोर से अंदर धकेलता, वो चीखती, टाँगें उसकी कमर पर लपेट लेती, जैसे वो कभी उसे छोड़ना नहीं चाहती।
उसने उसे हर पोज़िशन में अपना किया था।
पहले मिशनरी गहरा, धीमा, उसका चेहरा देखते हुए जब वो टूट रही थी, आनंद के आँसू गालों पर बहते हुए, वो उसका नाम फुसफुसा रही थी जैसे वो एकमात्र शब्द जानती हो।
फिर उसने उसे पलटा, कमर ऊपर की, और पीछे से लिया जोरदार, बेरहम, एक हाथ उसके लंबे काले बालों में फँसाकर, दूसरा कमर पर इतनी जोर से पकड़कर कि शायद निशान पड़ गए हों। वो पीछे धक्का मार रही थी, हर ज़ोरदार धक्के का जवाब दे रही थी, कराह रही थी जैसे वो मर रही हो और फिर जन्म ले रही हो।
बाद में उसने हेडबोर्ड से टेक लगाई और उसे अपनी गोद में खींच लिया वो उस पर सवार, छोटे हाथ उसकी छाती पर, कमर घुमा रही थी जबकि वो उसके निप्पल्स सक रहा था और उसके कान में गंदी बातें फुसफुसा रहा था “तुम्हें महसूस हो रहा है मैं कितना गहरा हूँ? ये अब मेरी है... सिर्फ़ मेरी...”
उसने उस बार इतनी जोर से उसके पार्ट को अपना दिया था काँपती हुई, रोती हुई, नाखून उसकी छाती पर गाड़ते हुए, नए लाल निशान छोड़ते हुए।
और आखिरी बार... उसने उसे पेट के बल लिटाया, टाँगें चौड़ी कीं, और उसे मैट्रेस में धकेलते हुए अपना किया जब तक वो ज़्यादा उत्तेजना से रोने लगी, उससे अंदर की भीख मांग रही थी। वो गहराई से, गर्म, उसे पूरी तरह भरते हुए जबकि वो उसके नीचे काँप रही थी।
वेदांत ने आँखें खोलीं, फिर से उस खून के दाग को देखा।
“उसने मुझे सब कुछ दिया,” उसने फुसफुसाया, आवाज़ में विस्मय और मालिकाना अहसास। “उसका पहला खून... उसकी पहली चीखें..."
उसका हाथ नीचे सरका, उंगलियाँ अपने सख्त हो रहे पार्ट पर फिसलीं। यादें ही काफी थीं उसे फिर से तड़पाने के लिए।
वो धीरे-धीरे, गहरे, खतरनाक अंदाज़ में मुस्कुराया।
“आधिरा... उसका नाम आधिरा था,” उसे अचानक याद आया। रात में उसने फुसफुसाया था। उसने नाम को ज़ोर से कहा, जैसे स्वाद चख रहा हो। “आधिरा... इतनी जल्दी कहाँ चली गई?”
वो उसके चेहरे को याद करने की कोशिश करने लगा। मद्धिम रोशनी में और दोनों नशे और चाहत में डूबे हुए, उसने ठीक से नहीं देखा था। लंबे काले बाल, नरम त्वचा, बड़ी मासूम आँखें... लेकिन पूरा चेहरा नहीं। “वो बिस्तर पर परफेक्ट थी... इतनी खूबसूरत, इतनी नाजुक, इतनी मेरी,” उसने सोचा। उसका जुनून पहले से ही बढ़ रहा था। वो एक रात काफी नहीं थी। वो और चाहता था। वो उसे पूरी तरह अपना बनाना चाहता था।
वेदांत चीज़ों को आसानी से छोड़ने वाला नहीं था। खासकर ऐसी चीज़ या इंसान जिसने उसे इतने लंबे वक्त बाद जिंदा महसूस कराया हो।
उसने साइड टेबल से फोन उठाया और अपने असिस्टेंट कबीर को कॉल किया। कबीर सिर्फ़ कर्मचारी नहीं था वो वेदांत का फिक्सर था, वो जो सब कुछ संभालता था, यहाँ तक कि अंधेरे काम भी।
“कबीर, अभी मेरे कमरे में आ,” वेदांत ने गहरी, कमांडिंग आवाज़ में कहा।
दस मिनट में कबीर ने दस्तक दी और अंदर आया। वो 32 साल का था, लंबा, गंभीर, और हमेशा वफादार। “जी, बॉस?”
वेदांत बाथरूम में था, जल्दी नहा रहा था। वो तौलिए लपेटे बाहर आया, बालों से पानी टपक रहा था। “कल रात यहाँ एक लड़की थी। नाम आधिरा। पूरा नाम या नंबर नहीं है। लेकिन वो पार्टी में थी। उसे ढूँढो। मुझे सब डिटेल चाहिए कहाँ रहती है, क्या करती है, सब कुछ। होटल के कैमरे, गेस्ट लिस्ट, जो भी ज़रूरी हो।”
कबीर ने बिना सवाल किए सिर हिलाया। वो वेदांत की फितरत जानता था। जब बॉस किसी चीज़ को चाहता है, तो वो मिलती है। वो बोला “कोई डिस्क्रिप्शन, सर?”
वेदांत एक पल सोचा। वो बोला “लंबे गहरे भूरे बाल, करीब 23 साल, 5'6", पतली, खूबसूरत। कल रात काला ऑफ-शोल्डर ड्रेस। बहुत मासूम चेहरा... लेकिन अंदर आग।” वो फिर मुस्कुराया, याद करते हुए। “और चेक करो कि आज सुबह किसी ने उसे जाते देखा या नहीं। वो मेरे जागने से पहले भाग गई।”
कबीर ने भौंहें चढ़ाईं लेकिन कुछ नहीं कहा। वो बोला “अभी शुरू करता हूँ। और कुछ?”
वेदांत ने एक बार फिर चादर पर नज़र डाली, खून के दाग को हल्के से छुआ। वो बोला “हाँ। हाउसकीपिंग आने से पहले ये चादरें बदल दो। और अगले वीकेंड के लिए ये कमरा फिर से बुक कर लो। जस्ट इन केस।”
कबीर समझ गया। वो बोला “हो जाएगा, बॉस।”
वेदांत ने कबीर द्वारा लाए गए फ्रेश सूट में कपड़े पहने। काली शर्ट, काला कोट उसका आम पावरफुल लुक। कमरे से निकलने से पहले वो खिड़की पर खड़ा हुआ और नीचे मुंबई की व्यस्त सड़कों को देखा।
“आधिरा... तुम भाग सकती हो, लेकिन छुप नहीं सकती। वो रात तो सिर्फ़ शुरुआत थी। तुम पहले से ही मेरे दिमाग में हो... और जल्द ही तुम मेरी ज़िंदगी में भी होगी। पूरी तरह।” उसकी आवाज़ धीमी, खतरनाक, जुनून से भरी थी।
वो कमरे से बाहर निकला, एक नई मकसद के साथ। कल रात की वो बेनामी लड़की अब नाम वाली हो चुकी थी और जल्द ही उसे उसके सामने आना ही पड़ेगा।
आधिरा अपने छोटे अपार्टमेंट में शॉवर में खड़ी रो रही थी, निशानों और यादों को धोने की कोशिश कर रही थी। वो टूटी हुई, डरी हुई और शर्म से भरी हुई महसूस कर रही थी। “ये एक गलती थी... बस एक बड़ी गलती। मैं इसे भूल जाऊँगी। मैं कभी इसके बारे में नहीं सोचूँगी,” उसने खुद से कहा।
लेकिन गहरे अंदर दोनों जानते थे कि ये अंत नहीं था। ये तो बस एक अंधेरे, तीव्र, और रोक न पाने वाली शुरुआत थी।
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